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Velas Turtle Festival in Hindi

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ओ कासव सिर्फ तुम्हारे लिए

ओ "कासव" सिर्फ तुम्हारे लिए......
महाराष्ट्र का कोंकण क्षेत्र अपनी प्राकृतिक छटओं के लिए जाना जाता है। कोंकण के इसी क्षेत्र में रत्नागिरी के पास एक बेहद खूबसूरत गांव पड़ता है वेळास। दुनियाभर के पर्यटकों की नजरों से बचा रहा, अरब सागर के किनारे बसा करीब 15 सौ की आबादी वाला यह गांव अब पर्यटन के नक्शे पर अपनी जगह बना रहा है और इसकी वहज है यहां के समुद्री किनारों से निकलने वाले छोटे-छोटे कछुए , टर्टल फेस्टिवल और उनका संरक्षण कार्यक्रम।

वेळास समुद्री किनारों

वेळास के समुद्री किनारों पर हर साल बड़ी तादाद में मादा कछुओं की एक प्रजाति अंडे देने के लिए आती है। आॅलिव रिडल नामक कछुओं की यह प्रजाति लुप्तप्राय यािन एडेंजर्ड घोषित की जा चुकी है। वेळास में इन कछुओं के आने और अंडे देने का सिलसिला वैसे तो वर्षों से चला आ रहा है लेकिन जानकारी के अभाव में जाने-अनजाने इसी गांव के लोग इन अंडों और इनसे निकलने वाले कछुओं को नुकसान पहुंचाते रहे थे। या तो स्वाद के लिए वे अंडों को पकाकर खा जाते थे या बच्चे निकलने पर तस्करों को उन्हें बेच दिया करते थे।

Velas Beach Turtle Conservation

अंडों और कछुए के बच्चों को बेचने की कुप्रथा में 2002-03 के बाद बदलाव आना शुरू हुए जब एनजीओ सहयाद्री निसर्ग मित्र ने गांव-गांव और घर-घर में जाकर ग्रामीणों को पर्यावरण में कछुओं के महत्व के बारे में बताया। यह सब इतना आसान नहीं था क्योंकि गांव के लोगों को कछुओं की स्मगलिंग से मोटी कमाई होती थी और कछुओं का सरंक्षण करने पर वे इस कमाई के साथ और भी फायदों से वंचित रह जाते। ग्रामीणों को कछुए मारने से रोकने से ज्यादा कठिन था उनकी मानसिकता को कछुओं के प्रति सकारात्मक बनाना। एनजीओ के सदस्यों ने घरों के साथ ही स्कूली बच्चों को कछुए के संरक्षण के लिए प्रेरित किया और करीब चार-पांच सालों की मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी। एनजीओ के सदस्यों के मुताबिक आज गावं में एक भी शख्स अंडों की चोरी या कछुओं की हत्या नहीं करता बल्कि यहां आने वाले पर्यटकों को गांव के लोग अपने घरों में ही रुकने और खाने की व्यवस्था करते हैं। ओ कासव (कछुए को मराठी में कासव कहा जाता है) सिर्फ तुम्हारे लिए......यहां आने पर आप महसूस कर सकेंगे कि वेळास गांव का हर शख्स अब शायद इसी विचार के साथ जीने लगा है।

सुबह अंधेरे घर से निकलकर यदि आप पैदल ही समुद्र की ओर जाएंगे तो आपको इस गांव की खूबसूरती को ज्यादा नज़दीक से देखने का मौका मिलेगा। साफ-सुधरी सड़कों के किनारे बने छोटे और खूबसूरत घर, उनके आंगन-बाड़े में लगे नारियल, पाम, केले के पेड़ और उनके बीच की शांति....घरों के बाहर बनी रंगोली और उन पर रखी धूप से उठती लोभान की खुशबू....मंदिर में बजते मराठी भजनों का सुकून भरा स्वर। यकिन मानिए शहर में इस तरह की शांति आप लाखों रुपए देकर भी खरीद नहीं पाएंगे जो यहां प्रकृति मुफ्त में लुटा रही है। इस जगह की सबसे खास बात यह है कि यहां मोबाइल नेटवर्क मिलना उतना ही मुश्किल है जितना शोर दोनों को खोजने के लिए आपकाे मेहनत करनी होगी। मोबाइल नेटवर्क नहीं होने का फायदा यह है कि हमारी सारी स्मार्टनेस (स्मार्टफोन की) साथ लाए बैग्स में बंद होकर रह जाती है।

Kasav Mahotsav

तट पर पहुंचते ही सामने एक पिंजरा और उसमें रखी उलटी टोकरियां नजर आती हैं। इस जगह का सारा रोमांच इन्हीं टोकरियों के नीचे दबा होता है क्योंकि ना आप जानते हैं और ना ही सहयाद्री निसर्ग मित्र के सदस्य, कि इन टोकरियों के नीचे से वो निकलेगा भी या नहीं जिन्हें देखने हम इतनी दूर आए हैं यानि कछुए के बच्चे। आप किस्मत के धनी हैं तो 60-65 बच्चे भी आपको नजर आ सकते हैं या फिर एक भी टर्टल देखने के लिए आपको अगले दिन या अगले टूर तक का इंतजार करना पड़ सकता है।

वेळास का नैसर्गिक सौंदर्य

वेळास का नैसर्गिक सौंदर्य भी उस अनुभव के आगे फीका नज़र आता है जब कछुए के बच्चे अपने नन्हे कदमों से स्वत: ही समुद्र की ओर चल पड़ते हैं। चूंकि इस तट पर निकलने वाले कछुए लुप्तप्राय प्रजाति के हैं इसलिए आप इन्हें हाथ में नहीं ले सकते। केवल जीभरकर फोटो खींच सकते हैं वो भी सिर्फ फ्लैश लाइट बंद करके। बेरिकेटिंग के बीच एनजीओ के सदस्य इन बच्चों को समुद्र में जाने के लिए छोड़ते हैं और आस-पास मौजूद लोग बस एक बेहतरीन फाेटो के लिए तड़ातड़ कैमरा चलाते रहते हैं।

वेळास की एक ओर खूबसूरती है यहां रहने और खाने की व्यवस्था। छोटा सा गांव होने की वजह से यहां होटल नहीं है लिहाजा पर्यटकों को ग्रामीणों के घरों में ही रहना और खाना पड़ता है। मिट्टी के आंगने और पक्की दीवारों वाले इन घरों में भी उतना ही सुकून है जितना यहां के माहौल में। रात को सोते वक्त आप समुद्र की लहरों को बगैर कान लगाए भी सुन सकते हैं फिर भलें आप िकसी भी गली के किसी भी घर में रुके हों। आप यदि खाने के शौकिन हैं तो कोंकणी खाने से लज्जतदार आपको कुछ नहीं लगेगा। ठेठ कोंकणी अंदाज में बनी वो भाजी-तरकारी भी आप चाव से खाएंगे जिसे देखकर आप अपने घर में बुरा सा मुंह बनाते हैं। यहां का खाना शायद इसलिए भी स्वादिष्ट होता है कि उसमें मसालों के साथ बनाने वाली आई, मौशी, कक्कू या वईणीं का प्रेम भी पड़ता है। खाना कम लग रहा है तो और मांगिए, जीभरके खाईए.....यहां कोई बंदिश नहीं।

वेळास आने के लिए वैसे तो महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बसें उपलब्ध हैं लेकिन मुंबई के किसी भी टूर ऑपरेटर के साथ आना ज्यादा सहूलियत भरा हो सकता है क्योंकि हर साल फरवरी से मार्च तक चलने वाले कासव महोत्सव यानि टर्टल फेस्टिवल में हजारों लोग इन्हीं टूर्स के माध्यम से आते हैं और यदि आपका टूर मैनेजर ट्रेक्स एंड ट्रेल्स के अंकित सावला जैसा कोई है (जो कि किस्मत से हमारे टूर मैनेजर थे) तो ये टूर और पर शानदार होगा। मुंबई से करीब 245 किलोमीटर की दूरी का सफर बस या कार से पांच घंटों में पूरा कर यहां आया जा सकता है। सप्ताहंत के दो दिन इस जगह की खूबसूरती के लिए पर्याप्त् हैं।

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